Sunday, 26 July 2009

उदास कमरा


अगर वे चीजें जो खामोश रहती हैं बोलने लगें जैसे घर का सामान, यातायात के साधन, खाने पीने की चीजें और ईश्वर तो हमारी जिंदगी कैसी होगी। इसी फंतासी पर पेश हैं कुछ कहानियाँ। हाँ ये कहानियाँ सिफॆ फंतासी नहीं हैं इनमें जिंदगी और हमारे विश्वासों आदि का विश्लेषण भी है----

उदास कमरा

कमरा तो कमरा ही रहता है कभी घर नहीं बन सकता। एक रात थक हार कर घर लौटा। मुँह-हाँथ धो कर टीवी खोल लिया। खाना बाहर से ही खा कर आया था। टीवी पर खबर चल रही थी। एक लड़की ने अकेलेपन से ऊब कर आत्महत्या कर ली। इस दौड़ते भागते शहर में अकेलापन। टीवी म्यूट कर सोंचने लगा। आँखें छत पर टंगी थीं। कमरे ने कहा, अकेलापन तुम्हें क्यों लगेगा। कभी सेमिनार में, कभी आफिस में, कभी महिलाओं के आगोश में। कभी सोचा है जिन शहरों की सड़कों पर तिल रखने की जगह नहीं होती उन शहरों में कमरे कितने अकेले होते हैं। सुनते-सुनते सो गया। आँख खुली तो जान पाया कि मैं तो कल कमरे पर गया ही नहीं। पीने के बाद दोस्त के घर पर ही सो गया। खैर अपने कमरे पर जाने के लिए दोस्त को बाय बोला। बस से लाजपत नगर पहुँचा। कमरे वाली गली में मुड़ा वो मकान तो था ही नहीं जिसके एक कमरे में मैं रहा करता था। सुबह के छः बज रहे थे। दिमाग भन्ना रहा था। दारू की खुमारी उतरी नहीं थी। शायद रास्ता भूल गया हूँ। चौराहे पर पहुँचा चाय ली और सिगरेट सुलगा ली। बेंच पर पड़ा पेपर उठाया। अंदर के पन्ने पर खबर थी।........................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................ लाजपत नगर में अवैध कालोनी गिराई गई, रातोंरात मलबा साफ

8 comments:

Unknown said...

it was really horrifying that the author was not present at his room otherwise he would have been thrown out of his room and he would have been in search of a new room.

Unknown said...

tooti-dahti imaraton...pai ek naya sahar kab kabiz ho jai..pata bhi nahi lagta...
khair...saurabh bahi..bahut acchi suruwaat hai..aapki agli kadi ka intzaar rahega.

anurag said...

बेहतरीन...
ब्‍लॉग ने अद्भुद सोच रखने वालों को एक जरिया दिया है।
आप का स्‍वागत है।
दासमलूका

Dhaiakhar said...

ब्‍लॉग्‍ा की दुनिया में आपका स्‍वागत है। आते ही आपने अपनी धार की झलक दे दी है। उम्‍मीद है इस मंच पर आपकी प्रतिभा के विभिन्‍न आयामों को देखने, पढ़ने और समझने का मौका मिलेगा।
आपने इस लघु कथा के जरिए हमारे समाज और समय की त्रासदी को जिस तरह पेश किया, वो काबिले तारीफ है।

Amal Chowdhury said...

Achcha laga. Ab is kadi mein agli bolti cheez ka intezar hai... (kya ho agar ek din apki diary apse kuch bol pade...)

Unknown said...

बेशक कमरा अकेला होता है वो चाहे शहर में हो या कहीं किसी कस्बे में, लेकिन इस अकेलेपन के लिए भी हम खुद ही जिम्मेदार है इसे समझने की जरुरत है. हम इतने आत्मकेंद्रित होते जा रहे है की रिश्तो को भी अपने हिसाब से परिभाषित करने लगे है. हम मकान बनाने में विश्वास करते है घर बनाने में नहीं. मकान कितना ही बड़ा हो वो घर नहीं बन सकता, घर रिश्तो की बुनियाद पर बनता है. येही वजह है की भीडभाड वाले शहरों में भी लोग अकेले है. कहानी में इस अकेलेपन की समस्या को बेहतर तरीके से बताया गया है और ये भी समझाने की कोशिश की गयी की कैसे ये समस्या समाज को अवसाद से ग्रस्त कर रही है. अच्छा प्रयास है तुम्हारा, उम्मीद है की अगली कहानी पाठको को इस समस्या से बाहर आने के लिए प्रेरित करेगी.

devendra sahu said...

ek tera hona kya se kya kar deta hai
ent ki dewaron ko sone sa ghar kar deta hai
marak nahi vicharak missile ka bolg ki dunia me apar sambhavnao ke satha swagat....
ye sanyog hi hai ki arihant bhi kal hi launch hui hai

Unknown said...

शानदार लाजवाब अद्भुत