Wednesday, 29 July 2009

ब्लॉग पर एक स्पॉट ‘ईश्वर’ के नाम


मनुष्य की ईश्वर तक की यात्रा मिथकीय चेतना से होकर गुजरती है। पल-पल बदलती दुनिया ने इस चेतना का निर्माण करने वाले तत्वों को उलट-पलट दिया है। जहिर है नई दुनिया में जन्म लेने वाले हमारे नेटिजियन की चेतना वैसी नहीं है जसी पिछली पीढ़ी के लोगों की थी। नई पीढ़ी की इसी चेतना को पकड़ने का प्रयास करते सौरभ श्रीवास्तव पिछले दिनों खबरिया चैनल पर एक समाचार दिखा। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का ईश्वर से संवाद। वाकया कुछ इस तरह हुआ-अमिताभ अपना ब्लॉग लिख रहे थे। साथ ही कोई चैटिंग साइट भी खुली हुई थी। अचानक एक पॉपअप आया। बिग बी ने पूछा आप कौन हैं? जवाब आया-ईश्वर। तुरंत विचार आया जरूर यह कोई छद्म है लेकिन यह विचार उतना प्रभावी नहीं था जितना कि चैटिंग पर ‘ईश्वर’ का मिलना। यदि ऐसा न होता तो संवाद वहीं खत्म हो जाता पर संवाद जारी रहा। बिग बी सवाल पूछते रहे और ‘ईश्वर’ जवाब देते रहे। सवाल भी ऐसे जो प्रत्याशित तौर पर ईश्वर से ही किए जा सकते हैं। जैसे-अच्छे व्यक्ति को हमेशा कष्ट क्यों होता है? इन कष्टों का निवारण क्या है? आदि-आदि। जवाब भी ऐसे जो ईश्वर ही दे सकते हैं। यानी एक अप्रत्याशित घटना का प्रत्याशित विस्तार। इस पूरी घटना को कोई भी समझदार आदमी महज फंतासी या प्रचार का शगल मान कर आगे बढ़ सकता है। खबरिया चैनल पर यह समाचार देखने के बाद ज्यादातर लोगों ने यही किया भी होगा। या तो चैनल बदल दिया होगा या बूढ़े होते बिग-बी का मजक उड़ाया होगा, लेकिन क्या बात यहीं खत्म हो गई? नहीं। अगले दिन खबर चर्चा में रही। मजकिया लहजे में ही सही लोगों ने इसका जिक्र एक-दूसरे से किया और बात फैलती गई। ईश्वर अपने मकसद में सफल रहे। वह यही तो चाहते थे। साइबर संसार में दिन-रात खोए रहने वाले लोगों को उनकी याद आए। आम जनता को ईश्वर की याद न आना उन्हें अपने अस्तित्व के लिए चुनौती जान पड़ता है। उन्हें याद दिलाना था कि हम हैं। संसार में ही नहीं साइबर संसार में भी हैं। सो, उन्होंने एक भक्त को चुना, जो अपने तमाम साथियों को बताए कि ईश्वर ने नया अवतार लिया है। अब चूँकि आम आदमी हमेशा खास आदमी की बात सुनता है इसलिए ईश्वर ने सेलेब्रिटी को चुना। बिग बी कहेंगे तो लोग सुनेंगे और तरजीह भी देंगे। ईश्वर ने इस तरह से कई लोगों का कल्याण किया। उस खबरिया चैनल के मालिक का भी। अरे भाई उसके चैनल की टीआरपी जो बढ़ा दी। चैनल ने खबर को खूब खींचा। खूब कौतूहल पैदा किया। साइबर स्पेस में यह ईश्वर का मनोरंजक अवतार था। खैर, बात खत्म हुई। टीवी बंद करके मैं सो गया। अगली सुबह उठा और टहलने निकल गया। पार्क में ज्यादातर चेहरे जने-पहचाने। वही घरेलू महिलाएँ, रिटायर बुजुर्ग और कुछ खिलाड़ीनुमा युवा। तभी २५-२६ वर्ष का एक युवक बगल से गुजरा। एडीडास का ट्रैक सूट, कलाई में रिस्ट बैण्ड, कान में आईपॉड के साथ जॉगिंग शूज से लैस। मुझे लगा कॉलोनी में नया आया होगा। पार्क के दो चक्कर लगाकर वह युवक बेंच पर बैठकर हाँफने लगा। मैं पास से गुजरा तो पूछा-कॉलोनी में नए हो? नहीं-जवाब मिला। पहले तो नहीं देखा? मैंने अगला सवाल किया। आप लोग देखना ही नहीं चाहते हैं तो कैसे देखेंगे? मुङो अटपटा लगा पर संवाद जरी रखने के लिए मैने सवाल दागा, क्या नाम है तुम्हारा? जवाब मिला-ईश्वर। पूरा नाम? क्या ईश्वर अपने आप में अपूर्ण है? सवाल के जवाब में उसने सवाल किया। मैं सकपका गया। बात खत्म कर आगे बढ़ना बेहतर लगा। मैंने लगभग टालने वाले अंदाज में कहा, ‘मैं सामने वाले घर में रहता हूँ। कभी चाय पर आओ।’ करीब दस बजे घर की घंटी बजी। ईश्वर आया था। मैंने उसे ड्रॉइंग रूम में बैठा दिया और परदे खींच दिए। ताकि वह घर के भीतर न झाँक सके। हम अक्सर ऐसा करते हैं बिना इसकी परवाह किए कि सामने वाला क्या सोचेगा। खैर! मैं चाय लेकर पहुँचा। तुम्हारा मकान नंबर क्या है- मैंने सवाल किया। ‘मैं किसी मकान में नहीं रहता। रह भी नहीं सकता। मैं तो सर्वव्यापी हूँ।’ ईश्वर ने जवाब दिया। कौतूहल बढ़ने लगा। मैं मजाक के मूड में आ गया-हे ईश्वर! आपका मुकुट और आभूषण कहाँ है। तुम भी तो धोती की जगह जींस और कुर्ते की जगह टी शर्ट पहने हो। ‘क्या आप लोग चाहते हैं ईश्वर हमेशा पुरातनपंथी रहे, जसे वह सदियों से है?’ मुझे लगा मैंने ईश्वर की दुखती रग पर हाथ रख दिया। उसने बोलना जारी रखा-‘दुनियावालों ने कितनी तरक्की कर ली। पहिए के अविष्कार से शुरू हुआ सिलसिला नैनो तक पहुँच गया है। आगे कहाँ तक जएगा, पता नहीं। मैंने बीच में टोका पर आप तो ईश्वर हैं आपको पता नहीं? ईश्वर बिफर गए। हाँ, नहीं पता रोज तो बदलती रहती है आप लोगों की दुनिया। कोई कितना ध्यान रखे और फिर यह साइबर संसार। दुनिया का हर कोना एक-दूसरे से जुड़ा है। हर आदमी अपने दोस्तों के साथ व्यस्त है। किसी को मेरे लिए फुर्सत ही नहीं। हाँ, धर्म-कर्म की साइटें हैं। पर ऐसे लोगों को आप जसे हाईटेक लोगों ने एक कोना दे दिया है। पड़े रहो और चलाते रहो अपना धंधा। आप लोग खुश होते हैं तो दोस्तों को ई-मेल करके उन्हें साझेदार बना लेते हैं। दुखी हुए तो चैट कर गम हल्का कर लिया। ज्ञान के लिए मेरी तपस्या करने के बजय गूगल खोल लेते हैं। असल जिन्दगी में तो मुझे कभी-कभार याद भी कर लेते हैं पर साइबर संसार में तो मेरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मुझसे बड़े चमत्कार तो गूगल कर रहा है। मेरा सर्वव्यापी होना खतरे में है। सर्वव्यापी न रहा तो ईश्वर भी न रहूँगा। पर आप लोग चिंता न करें मैं यह लड़ाई इतनी आसानी से हारने वाला नहीं हूँ। साइबर संसार में खुद को स्थापित करने के लिए मैंने कम्प्यूटर सीखना शुरू कर दिया है। जल्द ही इंटरनेट पर मेरा कब्जा होगा।’ मैं हतप्रभ ईश्वर को सुन रहा था। ईश्वर ने मुझे हिलाया। ‘कहाँ खो गए? मेरे कम्प्यूटर क्लासेस का वक्त हो रहा है। चलता हूँ।’ कह कर ईश्वर चले गए। एक दिन मैं नेट सर्फिग कर रहा था। याहू चैट पर अचानक एक पॉप अप खुला। मैंने पूछा कौन? पहचाना नहीं, ईश्वर!
हिन्दुस्तान के लखनऊ संस्करण में २७-०७-२००९ को प्रकाशित (साभार)

6 comments:

Mohammed Umar Kairanvi said...

साइबर में जगत में स्वागत है,

Unknown said...

tana bana umda rachaaa

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

बेहतरीन्!!!

Unknown said...

दूसरी कहानी कब आ रही है

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Bhartendu 'BHARAT' said...

achi sonch ka achha udaharan